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भारतीय राजनीति किस मोड़ पर

भारतीय राजनीति किस मोड़ पर ?


आज भारतीय राजनीति जिस मोड़ पर खड़ी है, उसमें इस सवाल का उत्तर तलाशना होगा कि राजनीति केवल दल हित के लिए है या इसका सरोकार राष्ट्रहित से है या नहीं? राजनीतिक धूर्तता का परिणाम जनजीवन और देश हित को प्रभावित कितना करेगा?

आज की राजनीतिक परिस्थिति में केवल राजनीतिक कदम के लिए कई प्रकार के हथकंडे अपनाए जा रहे हैं। इस बात का भी किसी को ध्यान नहीं रहता कि उनके कारनामो से राष्ट्रहित कितना प्रभावित होता है और दुनिया में उनकी हरकतों का क्या प्रभाव होता है, राजनीतिक लक्ष्य राष्ट्र और समाज हित से परे हो जाता है तो फिर राजनीति देश के लिए संकट का कारण भी बन सकती है। राष्ट्र और समाज हित के नाम के राजनीति को किसी एक बिन्दु पर लिखने की अपेक्षा रहती है। राजनीति का भी धर्म राष्ट्र के लिए होता है। यदि नेतृत्व राष्ट्रहित को भी राजनीति की बलि चढ़ाने के लिए तत्पर होता है या राष्ट्रहित को राजनीति से विलोपित कर देता है तो ऐसी राजनीति राष्ट्र के लिए संकट का कारण बन जाती है।



गांधीजी ने भी कहा था कि बिना धर्म के राजनीति वैश्या के समान, क्या हम उसी ओर जा रहे है?

एक प्रधानमंत्री पूरे देश का प्रतिनिधि है, जब वह प्रधानमंत्री हो जाता है तो वह केवल दल का नहीं रहता। उसके साथ देश की प्रतिष्ठा का सवाल जुड़ा रहता है, उसकी आवाज सवा सौ करोड़ लोगों की आवाज होती है।

लेकिन वही प्रधानमंत्री पूरे देश की न सोच कर पहले अपने और अपने दल के लिए सोचे तो ? क्या ऐसे आदमी के हाथों मे हमारा देश सुरक्षित रहेगा?


हम शकुनी राजनीति के कपटजाल में फंस चुके है? नेतृत्व केवल अपने और अपने दल के लिए है आरोपों की बौछार भी बिन बादल जैसी हो रही है



राजनीतिक बहस के दौरान भाषा में आ रही गिरावट का उल्लेख करती है। सैद्धांतिक रूप से सभी राजनीतिक व्यक्तियों को उनके इस विचार का स्वागत करना चाहिये। इस बात में कोई शक नहीं है कि हाल के समय में राजनीतिक बहस का स्तर लगातार गिरता जा रहा है और अधिकतर बहस एक दूसरे की आलोचना के स्थान पर अपशब्दों पर केंद्रित होकर रह गई हैं। असंसदीय भाषा और भावों का प्रयोग इतना आम हो गया है कि इस बात में अंतर करना काफी मुश्किल हो गया है कि क्या संसदीय है और क्या नहीं।


जिस प्रकार अपराधी छवि कि लोग निरंतर राजनीति में आ रहे हैं और विभिन्न सरकारों और राजनीतिक दलों में महत्वपूर्ण स्थान पा रहे हैं उसके बाद ऐसा होना कोई अप्रत्याशित नहीं है। संभ्रातवादी स्पष्टीकरण के रूप में इसे ‘‘हमारी राजनीति के अधीनस्थीकरण’’ का प्रतिफल कह सकते हैं और साथ ही इसका सीधा संबंध ‘‘मुख्यधारा की राजनीति के क्षेत्रीयकरण’’ से भी जोड़ा जा सकता है।




                                                           


आज एक गहन विश्लेषण और आत्मनिरीक्षण की आवश्यकता है । कि सिर्फ दूसरों को दोष देना और अपने गिरेबान में न झांकना ठीक नीति नहीं है। वे जो उपदेश दे रहे हैं उसे वास्तविकता में अपनाया भी जाना चाहिये। आप इस मुद्दे को लेकर जागरुक है लेकिन फिर भी हममें से प्रत्येक को आत्मविश्लेषण कर सुधारात्मक कदम उठाने होंगे।

भारत की राजनीति बदल गई है। ऐतिहासिक कारणों के अलावा पुराने दलों और राजनीतिक समूहों के लिये सिद्धांत काफी भारी हो गए हैं और कोई भी आसानी से पीछे हटने को तैयार नहीं है। इतिहास और वर्तमान दोनों ही इस मोड़ पर मिल रहे हैं जिसके नतीजतन एक ऐसी भाषा सामने आ रही है जिसे अभद्र कहा जा सकता है।

लेकिन आपको बता दें कि चीजें बदल रही हैं और यह बदलाव बेहतरी के लिये हो सकता है 

                 पूजा 

       पहाड़न की डायरी से 🖊🖋🖋🖋

        

                                                                   




Comments

  1. एक अनुपम संवेदनशील समीक्षा . . धन्यवाद

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